पहली बार नहीं हुआ है ऐसा जो पिछले हफ्ता हुआ मेरे साथ!

मैं दिल्ली के रॉकलैंड हॉस्पिटल से किसी से मिल कर निकला. रात के कोई ११ बज रहे होंगे और पेट्रोल लेने छतरपुर पेट्रोल पंप पर गया. उस वक़्त मेरी गाड़ी अकेली थी वहाँ. मेरी गाड़ी में पेट्रोल डल ही रहा था कि मेरे बगल में करीब २-३ फ़ीट बाएं और ५-६ फ़ीट आगे दूरी पर एक दूसरी गाड़ी आ कर रुकी. उस गाड़ी को एक लड़का चला रहा था – कोई २५-३० साल का होगा वो, ड्रिंक किये हुए लग रहा था और ऊंची आवाज़ में पेट्रोल पंप वाले से बात कर रहा था. फिर अगले ही कुछ सेकंड में वो गेट खोल कर बाहर निकला और आगे की ओर बढ़ गया. उसकी गाड़ी का गेट पूरा खुला हुआ था. मैंने उसकी साइड मिरर में देखा तो एक लेडी बैठी हुई दिखी, कोई ३० साल की होगी, पीली साडी में पल्लू माथे तक. मुझे लगा उसकी गाड़ी में कोई होगी. फिर एकदम से मेरे दिमाग में ख्याल आया की अगर गाड़ी खुली है और साइड मिरर में वो दिख रही है तो फिर तो वो मेरी गाड़ी में बैठी होगी! मैंने एकदम से पीछे मुड़ कर देखा अपनी गाड़ी में – कोई नहीं था. पर वो औरत फिर भी मुझे दिख रही थी, कभी कभी मुझे भी देख रही थी वो. मैंने उत्सुकता वश अपनी गाड़ी आगे बढ़ाई और बिलकुल उस गाड़ी के पास गया, मैंने अंदर झाँक कर देखा, उसकी गाड़ी में कोई नहीं था. फिर मैंने अपनी गाड़ी के आगे पीछे देखा, कहीं कोई नहीं था. बिलकुल सुनसान पेट्रोल पंप ! मेरे शरीर में थोड़ी झुरझुरी सी हुई, मैंने एक बार फिर अपनी गाड़ी में देखा, कोई नहीं दिखा. मैं अपने घर (गुडगाँव) की ओर बढ़ गया. रास्ते में मुझे और कुछ कहीं अजीब नहीं दिखा सिवाय इसके की ज्यादातर गाड़िया जो मुझे रास्ते में दिखी वो लड़किया चला रही थी – रात के ११.३० में गुडगाँव जाने वाली गाड़ियों में! इत्तेफाक हो सकता है ये तो खैर.

पर ऐसा वाक़या पहले भी मेरे साथ हो चुका है. पहली बार जब मैं मुनिरका में रहता था, JNU में पढ़ने से ठीक पहले कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था. अक्सर रात के २ बजे के आस पास मेरे घर के बाहर पायल की आवाज़ सुनाई देती थी. शुरू में तो मुझे लगा की कोई इसी वक़्त काम करके लौटती होगी. पर फिर उत्सुकतावश मैंने एक दिन देखने की कोशिश की कि कौन है – वो उम्र ही उत्सुकताओं वाली होती है. पर मुझे कोई नहीं दिखी. फिर मैंने कई रातों को ऐसे ही देखने कि कोशिश कि, पर आवाज़ सुनाई देने के बाद, मेरे देखते ही कोई नहीं दिखती थी. फिर मुझे गाँव कि बातें याद आ गईं, कि ऐसी स्थिति में चीजो को होने दो, जब तक कोई तुम्हे परेशान न करे. ये सिलसिला तब तक चला जब तक मैं JNU हॉस्टल में नहीं आ गया. जब मुझे माही हॉस्टल मिला तो उस हॉस्टल में रहने वाले हमलोग फर्स्ट बैच थे. मेरा रूम मेट एक फिजिक्स वाला लड़का था जो प्रोटेस्टेंट क्रिस्चियन था (अब वो पादरी बन गया है). पहली रात सोने के बाद जब हम लोग सुबह उठे तो पाया कि हमारी खिड़की के शीशे पर बाहर कि तरफ से कहीं खून के धब्बे थे. यों तो jnu में ऐसी बातों में कोई विश्वास नहीं करता इसलिये इस बात को सब ने हंसी में उड़ा दिया. हमने शीशा धो दिया. दूसरे दिन कुछ नहीं हुआ. अगले कुछ दिनों तक सब नार्मल चल रहा था, तभी एक दिन फिर से वैसा कि खून का धब्बा! और अगले दिन फिर से. फिर मेरे कुछ दोस्तों और मेरे रूम मेट को लगा कि कहीं कुछ है. फिर हमने कई रातो को जाग कर देखने की कोशिश की, पर फिर कभी कुछ ऐसा नहीं दिखा.
मेरे MA कम्पलीट करने के बाद, मुझे हॉस्टल छोड़ना पड़ा. मैं कुछ दिनों के लिए अपने एक दोस्त के साथ उसके रूम में ब्रह्मपुत्र हॉस्टल में रहने लगा. एक दिन रात को मेरे दोस्त ने कहा कि वो लाइब्रेरी जा रहा है और रात को देर से आएगा, और मैं डिस्टर्ब न होउ, इसलिए मैं रूम को खुला ही छोड़ दूँ. मैंने ऐसा ही किया, रात २ बजे उसने दरवाजा खटखटाया, मैंने खोला और तब ध्यान गया कि मैंने तो दरवाजा खुला छोड़ा था! फिर अंदर से बंद किसने किया? मुझे लगा कि शायद मैंने नींद में खुद ही बंद कर दिया होगा. एक-दो दिन बाद फिर ऐसा ही हुआ और ऐसा कई बार हुआ.
ऐसे बहुत से प्रकरण हैं, कुछ और बताऊंगा, समय मिलने पर.
सोंचता हूँ क्या सारा इत्तेफ़ाक़ ही था. मैंने तो सब कुछ इत्तेफ़ाक़ ही माना हुआ है. और अगर मुझे कोई परेशानी न हो रही हो, तो फिर इत्तेफ़ाक़ मानने में ही क्या हर्ज है!

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